इस ऑडियोबुक के बारे में
ग्लूपोव नाम के एक काल्पनिक शहर का यह वृत्तांत पुराने अभिलेखों से मिली नगरगाथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। 1731 से 1825 तक एक के बाद एक नगराध्यक्ष आते हैं, नए आदेश देते हैं और जनता के जीवन को अपने ढंग से बदलना चाहते हैं। किसी की समझ कुछ रटी हुई धमकियों तक सीमित है, तो कोई हर घर और सड़क को एक ही साँचे में ढालना चाहता है। शासक बदलते रहते हैं, लेकिन निवासियों के हिस्से में भय, अभाव और आज्ञापालन की माँग ही आती है।
मिखाइल साल्तिकोव-श्चेद्रिन इतिहासलेखन की गंभीर शैली में असंगत घटनाएँ सुनाकर निरंकुश सत्ता का व्यंग्य रचते हैं। बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए नगराध्यक्ष केवल हास्यास्पद व्यक्ति नहीं हैं; उनके पीछे शासन की मनमानी, दफ़्तरी भाषा और बल प्रयोग की आदत दिखाई देती है। नगरवासियों का धैर्य भी प्रश्नों से परे नहीं रहता। उपन्यास पूछता है कि सत्ता की हर नई सनक को सहते रहने वाला समाज अपने भविष्य को आकार देने की क्षमता कैसे खो देता है।